पारंपरिक झोपड़ीशिल्पग्राम

डांग झोंपड़ी – गुजरात

फसलों की बुआई कटाई, गेहँू की बालियों व मक्का की फूटती माजरों के 3619 के साथ भील आदिवाियों कासंगीत और नृत्य का अटूट-अविराम रिश्ता है। गाथायें और लीलाएं संगीत और नृत्य के माध्यम से डांग आदिवासियों के ईर्द गिर्द घूमती है। पहाड़ जंगल नाले उनकी जीवन शक्ति है तो नाच उनके रक्त कणों में रचा बसा है। ढोलक नगाड़े और शहनाई की धुनों पर भील युवक युवतियाँ एक दूजे के हाथ में हाथ और कमर पकड़ कर वादियों में रात रात भर नाचते झूमते है।

महाराष्ट्र की सीमा पर दक्षिण गुजरात के डांग क्षेत्र के सहयाद्री जंगल हरी भरी वादियों के मनोरम दृश्य जगह-जगह प्राकृतिक रमणीय उपवनों के मध्य झुरमुटों के बीच पेड़ों की शाखाओं और पत्तियों घास फूस से डांगी (भील) अपनी झोपड़ियाँ बनाते है। ऐसे ही डांग क्षेत्र की एक झोंपड़ी 22 बाई 22 का नमूना शिल्पग्राम में तैयार किया गया है। बांस की खपचियों की चटाई बुनकर उस पर मिट्टी गोबर की परत चढ़ाकर दीवारे बनाई जाती है। छोटे-छोटे घरों की छत खपरेल से ढ़की होती है। घर के चारों और काँटो की बाड़ है और 10-10 फीट स्थान छोड़ा गया है। प्रवेश द्वार पर फूस से ढ़का एक ढ़ालिया है। कच्चा आंगन लिपाई की दीवारें एक कमने के बाद दूसरा कमरा और बगल में वही दायी और चूल्हा और दूसरी और बांस लकड़ी का सोने व सामान रखने का प्लेटफार्म है।

झोंपड़ी में बांस की टाटी के किवाड़, मुर्गी घर अण्डा देने का बांस का कोलजा, मछली पकड़ने का बांस ‘‘मली’’ रोटी रखने की बांस की ‘‘डलकी’’ अनाज की कोठी मुश्की, मुर्गी बन्द करने का जीला, अनाज कूटने की दुरड़ी, लकड़ी का आउत (हल) लकड़ी का उंबल और देव व नामदेव आदि सहित ढाई दर्जन से अधिक डांग आदिवासियों की घरेलू वस्तुएं वहा उनके घरों के अनुरूप रखी हुई है।

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