पारंपरिक झोपड़ीशिल्पग्राम

मछुआरा झोंपड़ी – गोवा

मुद्र के किनारे बसने वाले गोवा के मछुआरे मुख्य रूप से ईसाई है। वे रात को मछली पकड़ने जाते हैं और सुबह वापस लौटते है। उनके घर के आगे बिखरे हुए जाल नाव और रस्से सामान्यतः देखने को मिलते है। मछली पकड़ना ही उनकी आजीविका का साधन है परन्तु वे कभी कभी लघु कृषि और नारियल को भी सहायक व्यवस्था के रूप में अपनाते हैं। मिट्टी में बनाएं गएं उनके आवास अत्यंत सामान्य होते हैं। जोड़ मलायों खजूर के पत्तों की चटाई दीवारों पर लगाई जाती है ताकि घरों की वर्षा से रक्षा हो सकें।

15/22 क्षेत्रफल की यह झोपड़ी वहाँ पाई जाने वाली वनस्पति के झुरमुटों से सटी हुई है। इसमें प्रवेश द्वार से पहले एक खुला वराण्डा जिस पर टाइल्स लगी ढ़लवा छत है दीवारों पर पक्की चिनाई के उपरान्त मिट्टी की दड़ाई और लिपाई वाली यह साधारण झोंपड़ी है। इसके बीचों बीच एक बड़ा ढलवा छत का कमरा है जिसमें मछली पालक अपने जीवन के समस्त घरेलू कारोबार चलाते है। यही सोने बैठने एवं खाने पीने की जगह है जिसमें एक चटाई बिछी है। एक तरफ ताड़ी निकालने की कांटी मछली काटने का चाकू आडोली बंेबू बास्केट स्टेण्ड खूरमणा पानी भरने की तांबे की माडकी कैक बनाने का खोरन लकड़ी के बास्केट पाटलियों और लेहे का दौया आदि तीन दर्जन तरह की वस्तुएं झोंपड़ी में संजोई गई है।

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