संस्कृति मंत्रालय की सहायता से संचालित योजनाए

1. राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना

2. गुरु शिष्य परम्परा

3. रंगमंच प्रोत्साहन योजना

4. युवा कलाकार प्रतिभा योजना

5. प्रलेखन

6. उत्तर पूर्व क्षेत्रों का ऑक्टेव कार्यक्रम

इन योजनाओं के अतिरिक्त क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों द्वारा अपने कौरपस से संचित ब्याज एवं अन्य स्रोतों से अर्जित आय से भी अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों में सामान्यतया मुखौटा बनाने, स्टोन कार्विंग की कार्यशालाओं के अलावा विभिन्न लोक शैलियों एवं शास्त्रीय कलाओं की कार्यशालाएं आयोजित की जाती है। सदस्य प्रांतों के अनुरोध पर उत्सव और कार्यक्रमों का आयोजन किया जातहै। ये सांस्कृतिक केन्द्र अन्य गैर सरकारी संगठनों के साथ सहयोग करके भी अपने सदस्य राज्यों में कार्यक्रमों का आयोजन करते है।

राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना (एन.सी.इ.पी)

राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना से तात्पर्य कलाकार, शिल्पकार, चित्रकार, मूर्तिकारों का अन्य राज्यों में गमन-आगमन द्वारा विभिन्न शोधार्थियों, अकादमियों, लेखकों, संगीतज्ञों व लोक कला के क्षेत्र में विशेषज्ञों व नवोदित कला साधकों के मध्य कला सेतु स्थापित करना है। जिसमें सेमीनार, प्रदर्शनी व कार्यशालाएं सम्मिलित हैं।

इस योजना के उद्देश्य-

भारत सरकार द्वारा देश के एक क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता और विलक्षणता को देश के अन्य क्षेत्रों तक सुगमता से पहुंचाने के उद्देश्य से यह योजना प्रारम्भ की गई है। इस योजना में देश की सांस्कृतिक अखण्डता को प्रबल, विभिन्न परंपराओं, मान्यताओं व पहनावा धारण करने व संस्कृति को मानने वाले लोगों में एकता बनाये रखने तथा एक दूसरे को सराहने व समझने की भावना को बढ़ावा देने के लिए के ध्येय से इस योजना में कला दलों व चाक्षुष कला/साहित्य दलों व विशेषज्ञों को अन्य राज्यों व क्षेत्रों में आदान प्रदान किया जाता है।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय एकात्मता एवं सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक महत्वपूर्ण यंत्र की तरह कार्य करता है। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र अपनी जरूरतों के अनुसार शिल्पग्राम उत्सव, लोक उत्सव, उमंग, पारंपरिक उत्सव जैसे वृहद समारोहों में कलाकार, शिल्पकार, नाट्य दलों, चित्रकारों इत्यादि को आमंत्रित करता है वहीं केन्द्र अन्य क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप कलाकार व शिल्पकार प्रायोजित करता है। प्रायोजक केन्द्र द्वारा इन कलाकारों का पारिश्रमिक एवं यात्रा व्यय वहन किया जाता है जबकि मेजबान केन्द्र द्वारा स्थानीय सुविधाएं मुहय्या करवाई जाती हैं। राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना के लिए कलाकारों/शिल्पकारों को देय भत्तों का निर्धारण भारत सरकार द्वारा समय-समय पर किया जाता है।

गुरु शिष्य परम्परा

परिचय

भारतीय संस्कृति में गुरुकुल की महान परंपरा है। गुरु शिष्य परम्परा “गुरु शिष्य परम्परा” की सच्ची परंपराओं में अपने शिष्यों को ज्ञान प्रदान करने के लिए महान गुरुओं की परिकल्पना करती है।

उद्देश्य

विगत कई वर्षो से गुरू- शिष्य परम्परा का आयेजन किया जा रहा है। इस योजना के अर्न्तगत शास्त्रीयगायन, नृत्य एवं लोक तथा जनजातीय कला विधाओं की प्रतिभाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर प्रोत्साहित किया जाता है । भारत सरकार के संस्कृति विभाग ने देश में विलुप्त हो रहे पारम्परिक कला विधाओं के लिए गुरू-शिष्य परम्परा का आरम्भ आर्थिकसहयोग प्रदान करने निर्णय पंचवर्षीय योजना में लिया। नई प्रतिभओं की खोज कर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रो द्वारा छात्रवृत्ति प्रशिक्षक एवं शिष्य को देने का निर्णय लिया है।
इस योजना के अर्न्तगत क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र विभिन्न कला विधाओं और उनके विशेषज्ञों की खोज योजना के कार्यान्वयन के लिये करेंगे। दृश्य कला, विशिष्ठ लोक चित्रकला, कठिन शास्त्रीय गायन नृत्य एवं विशिष्ठ वाघ यंत्रों के गायन की परम्परा तथा पारम्परिक कला विधाओं से उदियमान कलाकारोंको परिचित कराना है।
गुरू-शिष्य परम्परा योजना विशिष्टकला विधा के लिए दो वर्षों की होगी तथा आवश्यकतानुसार उसे एक वर्ष के लिए अतिरिक्त समय दिया जायेगा। इस विधा में 4 से 5 लोगों को चयनित किया जायेगा। एकविशेषज्ञों की समिति का गठन होगा जिसे सांस्कृतिक केन्द्रों की कार्यक्रम समिति गुरू को निर्धारित करेगी। गुरू विशेषज्ञ समिति के द्वारा शिष्यों का चयन करेगी।

ZCC के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया

आवेदन संबंधित संबंधित राज्य के सांस्कृतिक निदेशालय के माध्यम से या आवेदक गुरु / संस्थान द्वारा सीधे संबंधित ZCC को भेजे जाने चाहिए। उनके आवेदन में गुरु शिष्य परम्परा योजना को शुरू करने के औचित्य के साथ कला रूप का संक्षिप्त विवरण शामिल होना चाहिए।

गुरु शिष्य परम्परा 2005-06

S.No

1

2

3

4

5

6

Art Forms

पुतली कला

कुचामणी ख्याल

शहरी, पोवाड़ा

ऊवी विवाह गीत

घागरी

कीर्तन

Name of Guru & address

श्री महिपत कवी

श्री महबूब

आदिनाथ

श्री विमल दी दामोलकर

श्री शांता राम बी सावंत

श्री विवेक एल जोशी

प्रलेखन

पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर के सदस्य राज्य अपनी पारम्परिक सांस्कृतिक धरोहर के कारण जाने जाते है। इनमें अमूल्य कला शैलीयां जिनमें शास्त्रीय एवं लोक कला दोनों ही पाई जाती है का प्रलेखन अति आवश्यक है। अत: इन्हे विभिन्न चरणा में प्रलेखित किया जा रहा है। प्रथम चरणों में उन कला शैलियों का प्रलेखन किया जा रहा है। प्रलेखन का उद्देश्य यह है कि इस कला शैलियों को भावी पीढी के लिए संजोकर रखा जाए ताकी वह जान सके कि इन प्रकार की कला शैलियां हमारे यहां रही है साथ ही अगर संभव होतो उन्हे विकसित भी किया जा सके। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र निम्न प्रकार से प्रलेखन कर रहा है-

1- ध्वनी संकलन के माध्यम से
2- चित्रों के माध्यम से
3- छपाई (प्रकाशन) के माध्यम से
अपने उद्देश्य की पूर्ती हेतु केन्द्र कुछ लुप्त हो रही कला शैलियों के प्रलेखन से सम्बन्धित पुस्तकों के प्रकाशन मे भी मदद करता है।