पारंपरिक झोपड़ीशिल्पग्राम

सहरिया झोंपड़ी – राजस्थान

राजस्थान के दक्षिण पूर्वी जिले कोटा में पहाड़ियों की श्रृंखला के बीच एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है शहबाद। सहरिया वहाँ की प्रमुख जनजाति है पगडण्डी कहीं कहीं नजर आती है। पैरों के नीचे पत्ते ही पत्ते। कहीं पानी बह रहा है तो कही वर्षा में उगी घास बिन काटे ही खड़ी है। कुछ घरों का गांव। घर के बाहर कांटों की छोटी-छोटी लकड़ियाँ की बेतरतीब बाड़ा किसी पेड़ की डाली पर रंगीन कपड़ा फंसा है तो किसी पत्थर के उपर पुरीह, घर की दीवारों पर लौकी की बेल और पत्थर के अनेक कातलों से ढ़की छत और रहने का पात्र एक पर दो कमरे। दीवार पर देवी देवताओं के माण्डने। यह है एक चित्र सहरियां झोंपड़ी का।

सहरिया घर समूहों में बनाते है जिनको थोक कहते हैं। पत्थर और मिट्टी से घर की दीवारे खड़ी करते है छत खपरैल कातलों से ढ़की होती है। रसोई की दीवार पर मिट्टी से देव का प्रतीक बनाते है चित्र के सरल और स्वभाव के अलमस्त सहरिया आदिवासी अंचल की निर्धनताम्य जनजातियों में से है।

शिक्षा का एक दम अभाव एवं रोजगार के अछूत जंगल की छोटी उपज एवं मामूली मेहतन मजदूरी से अपना पेट पालते है। यहाँ सहरियों की दो झोंपड़िया बनाई गई है जो पास-पास में है। घड़ों के आगे खुला चबूतरियाँ है जहाँ आने जाने वाले बैठते है अन्दर आवास के कमरे खाने पीने सोने कार्य में प्रयुक्त होते है। पहले ये झोपड़ियाँ बांस बल्लियों एवं घासफूस की होती है परन्तु बनों में घास से लकड़ी के स्थान पर पत्थर मिट्टी प्रयुक्त होने लगे।

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