पारंपरिक झोपड़ीशिल्पग्राम

ढ़ोल झोंपड़ी – मेवाड़ राजस्थान

इस झोंपड़ी का प्रारूप उदयपुर जिले की गोगुन्दा तहसील के ढोल गांव से लिया गया है। यह कुम्हार का आवास है। इस दुमंजिली झोपड़ी की दीवारें पत्थर पर मिट्टी की लिपाई करके बनाई गई है। पहली मंजिल की छत बांसों से बनाई गई है दूसरी मंजिल की छत बांस से बनाई गई है और उसे खपरैल से ढ़का गया है। पांच कमरों वाले इस हवादार घर के बाहर एक और बरामदा है जिस पर कुम्हार चाक चलाता है।
दूसरी और एक बाड़ा है जो पशुओं के बांधने, कृषि उपकरण रखने तथा सब्जियाँ उगाने के काम आता है। झोंपड़ी की सजावट मांडणें से की जाती है। आवास के सामने दरवाले पर बनी मेहराब वाला कमरा दैनिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र है। अन्दर एक और आवासीय कमरा है जिसमें मिट्टी और गधे की लीद से एक बड़ी कोढ़ी विशेष कलात्मक ढ़ंग से बनाई गई है। यह कोठी अनाज, दूधदही एवं खानेपीने के सामान रखने के काम आती है। इसके दायी और कुम्हार का कोठार (स्टोर) घर है जिसमें उसके उत्पाद व बिक्री के लिये पड़े रहते है।

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